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बच्चों (children) के जन्म से माता-पिता को हमेशा 3 बातों का ध्यान रखना चाहिए, तभी वे संस्कारी बनेंगे

बच्चों (children) के जन्म से माता-पिता को हमेशा 3 बातों का ध्यान रखना चाहिए, तभी वे संस्कारी बनेंगे

आचार्य चाणक्य ने सुखी जीवन के लिए कई नीतियां दी हैं। अगर आप भी अपने जीवन में सुख शांति चाहते हैं तो चाणक्य के इन विचारों को अपने जीवन में जरूर लागू करें।

आचार्य चाणक्य की नीतियां और विचार आपको थोड़े कठोर लग सकते हैं, लेकिन यही कठोरता जीवन का सत्य है। भागदौड़ भरी जिंदगी में हम इन विचारों को भले ही नजरअंदाज कर दें, लेकिन ये शब्द जीवन की हर परीक्षा में आपकी मदद करेंगे। आज हम आचार्य चाणक्य के इन्हीं विचारों में से एक और विचार का विश्लेषण करेंगे। आज का विचार इस बात पर आधारित है कि बच्चों की परवरिश करते समय माता-पिता को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

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अपने इस बयान में आचार्य चाणक्य ने उन बातों के बारे में बताया है जो बच्चों की परवरिश करते समय माता-पिता को ध्यान में रखनी चाहिए। इस बयान में आचार्य ने कहा कि जब से बच्चा नवजात है, तब से उसे पांच साल तक बहुत प्यार करना चाहिए। यही वह समय होता है जब बच्चा मां के गर्भ से निकलकर दुनिया में आता है। उस समय उसे जो प्यार मिलेगा उसके आधार पर उसकी नींव बनेगी।

जैसा कि आप जानते हैं कि दुनिया में बच्चे के लिए माता-पिता से बेहतर कोई शिक्षक नहीं है। जन्म से लेकर पांच साल तक उसे इतना प्यार दो कि वह आपकी आंखों से इस दुनिया को देख ले। उसे एहसास होने दें कि उसके माता-पिता उससे कितना प्यार करते हैं। यह वह उम्र है जब बच्चे इस दुनिया को अपने माता-पिता की नजर से देखते हैं। इसलिए इस उम्र में बच्चे के प्यार में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए।

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चाणक्य ने आगे कहा कि जन्म के पांच साल से लेकर अगले दस साल तक माता-पिता को बच्चों को लाठियों से डराना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि यही वह उम्र होती है जब बच्चे सबसे ज्यादा बुराई करते हैं। बड़ों का सम्मान करना, लोगों से कैसे बात करनी है, अपने विचार कैसे व्यक्त करना है, सब कुछ उन्हें सिखाया जाता है। इस उम्र में बच्चे भी स्कूल जाने लगते हैं तो माता-पिता के अलावा अन्य लोग भी धीरे-धीरे उनके जीवन में शामिल होने लगते हैं। ऐसे में बच्चों को सबसे ज्यादा अटेंशन की जरूरत होती है। इस समय माता-पिता को चाहिए कि वे किसी भी गलती के लिए बच्चों को डंडों से डराएं। यानी उनके मन में एक बात होनी चाहिए कि गलती करने पर सजा भुगतनी पड़ेगी. जब माता-पिता की लाठी की चपेट में आने का डर उनके मन में बना रहेगा तो वे कोई भी गलती करने से बचेंगे।

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चाणक्य ने आगे कहा कि जब बच्चा 16 साल का हो जाए तो माता-पिता को बच्चों के दोस्त बनना चाहिए। यह एक ऐसी स्थिति होती है जब माता-पिता उन पर जरूरत से ज्यादा काबू नहीं रख पाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे यौवन में हैं और कुछ वर्षों के बाद वे वयस्क भी हो जाएंगे। ऐसे में माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों के दोस्त बनें। एक ऐसा दोस्त जिससे वो अपने दिल की हर बात शेयर कर सके। अगर इस उम्र में माता-पिता अपने बच्चों को अपनी बात कहने के लिए मजबूर करते हैं, तो बच्चा कभी भी माता-पिता से अपने दिल की बात नहीं कहेगा। हो सकता है कि वह उनसे भी बातें छुपाने लगे। इसी कारण आचार्य चाणक्य ने कहा है कि 5 वर्ष तक पुत्र का पालन-पोषण सावधानी और प्रेम से करना चाहिए। अगले दस साल तक उसे डंडे से धमकाना चाहिए। लेकिन जब वह 16 साल का हो जाए तो उसके साथ एक दोस्त जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए।

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